स्वामी विवेकानंद जब भी कोई नया विचार लोगों के सामने रखते थे, तो लोग मंत्रमुग्ध हो जाते थे। कोई तालियां बजाता, कोई उनको प्रणाम करता। अक्सर लोग स्वामी जी से पूछते थे कि आप इतनी प्रशंसा और सम्मान मिलने पर क्या करते हैं।
स्वामी विवेकानंद ने कहा, मैं सारे सम्मान और तारीफों को एक चुल्लू में जल की तरह भर लेता हूं। फिर उन्हें अपने गुरु स्वामी रामकृष्ण परमहंस के चरणों में समर्पित कर देता हूं।
उस व्यक्ति ने पूछा, आप ऐसा क्यों करते हैं?
स्वामी जी ने जवाब दिया कि ये जो भी ज्ञान, भाषा, वाकशैली और आकर्षण है, ये सब उन्हीं का दिया हुआ है। उन्हीं के प्रताप से है। उनके कारण ही हम ये सब कह पाते हैं। उनके बिना तो ये संभव ही नहीं है।
जब स्वामीजी ऐसा जवाब देते थे तो लोगों के मन में परमहंस की एक अलग ही तस्वीर बनती थी कि जिसका शिष्य इतना तेजस्वी है, वो गुरु स्वयं कितना प्रतापी होगा, लेकिन जो लोग रामकृष्ण परमहंस से मिले, उन्होंने पाया कि वे बिलकुल साधारण इंसान जैसे ही हैं।
स्वामी विवेकानंद जैसा तेज या वैसी बातें परमहंस में नहीं थीं, लेकिन उनका ही ज्ञान था जो स्वामी विवेकानंद ने दुनिया को दिया। परमहंस एकाकी स्वभाव के थे, वे ज्यादा लोगों में रहने के आदी नहीं थे। वे अच्छे वक्ता भी नहीं थे, न कभी कोई सभा आदि करते थे।
लेकिन, उनके विचारों को स्वामी विवेकानंद ने दुनिया तक पहुंचाया।
सीखः आप जो भी बातें कहें या ज्ञान दें, जरूरी नहीं है कि वो आपका अपना हो। अगर किसी दूसरे के पास ज्ञान का भंडार है, लेकिन वो समाज तक अपनी बातें नहीं पहुंचा पा रहा है तो हमें ऐसे लोगों के विचार दुनिया के सामने लाने चाहिए।


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