कहानी - गौतम बुद्ध उपदेश दे रहे थे। तभी उनके एक शिष्य ने पूछा, ‘सत्संग करते समय आप ऊपर बैठते हैं और अन्य संत भी ऊपर बैठते हैं। सत्संग सुनने वाले हम लोगों को नीचे बैठाया जाता है। ऐसा भेदभाव क्यों?’
बुद्ध ने मुस्कान के साथ जवाब दिया, ‘सत्संग विचारों के आदान-प्रदान की कोई कार्यशाला नहीं है। यहां कोई व्यक्ति अपनी विद्वत्ता दूसरों पर थोपना चाहे, ऐसा भी नहीं है। एक बात बताओ, क्या तुमने कभी किसी झरने में से पानी पिया है?’
शिष्य ने कहा, ‘हां, मैंने झरने में से पानी पिया है।’
बुद्ध बोले, ‘याद करो, तुम्हारी स्थिति क्या थी उस समय?’
शिष्य बोला, ‘उस समय झरना ऊपर से गिर रहा था और मैंने नीचे खड़े होकर पानी पिया।’
बुद्ध ने कहा, ‘बस यही सत्संग की व्यवस्था है। अगर जीवन का रस सत्संग रूपी झरने से लेना है तो नीचे ही बैठना पड़ता है, क्योंकि झरना ऊपर से नीचे आएगा।’
सीख - बुद्ध ने यहां हमें बताया है कि अगर हम किसी से कोई ज्ञान लेना चाहते हैं तो हमें अपना अहंकार छोड़ देना चाहिए। विनम्र स्वभाव के साथ ही हम ज्ञान की बातें सीख सकते हैं। ज्ञान देने वाले व्यक्ति का स्थान ऊंचा ही रखना चाहिए। जब ये बातें ध्यान रखी जाती हैं, तभी विचार एक से दूसरे व्यक्ति तक सही ढंग से पहुंचते हैं।


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