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आज का जीवन मंत्र:पति-पत्नी को हर धार्मिक काम एक-दूसरे की सहमति के साथ ही करना चाहिए
एक दिन शिवजी के मन में रामकथा सुनने की इच्छा हुई। उन्होंने देवी सती से कहा, 'आप भी मेरे साथ चलें, मैं रामकथा सुनने अगस्त्य ऋषि के आश्रम जा रहा हूं।' सती दक्ष प्रजापति की बेटी थीं। दक्ष की तरह ही सती भी बहुत विद्वान थीं। देवी हर काम तर्क के आधार पर करती थीं, उन्हें कथा सुनना पसंद नहीं था, लेकिन पति ने इच्छा बताई थी तो वे भी जाने के लिए तैयार हो गईं।

जब पति-पत्नी दोनों कथा में बैठे तो शिवजी तो बहुत ध्यान से कथा सुन रहे थे, लेकिन सती का ध्यान इधर-उधर भटक रहा था। कथा पूरी होने के बाद दोनों लौट रहे थे तो जिस रामकथा को वे सुन रहे थे, उसी राम की लीला चल रही थी। सीता का अपहरण हो गया था, राम रो रहे थे। राम को देखकर शिवजी ने सती से कहा, 'देखो, हम जिनकी कथा सुनकर आ रहे हैं, उनके दर्शन भी हो गए। कथा इस ढंग से सुनी जाना चाहिए।'

सती ने कहा, 'ये राम भगवान कैसे हो सकते हैं? ये तो रो रहे हैं।' देवी ने शिवजी से इस बात को लेकर बहस की और श्रीराम की परीक्षा लेने के लिए चली गईं।

सती ने देवी सीता का रूप धारण किया और वे श्रीराम के सामने पहुंच गईं। श्रीराम ने उन्हें देखा तो वे पहचान गए कि ये देवी सती हैं। इस तरह सती खुद ही परीक्षा में असफल हो गईं।

वहां से लौटकर सती शिवजी के पास पहुंचीं। सती ने शिवजी से कहा, 'मैंने तो श्रीराम की कोई परीक्षा नहीं ली है। मैं बिना परीक्षा लिए ही लौट आई हूं।'

शिवजी सती देवी की आदतों से परिचित थे। उन्होंने ध्यान लगाया और जान लिया कि सती देवी ने श्रीराम की परीक्षा किस तरह ली है। इसके बाद शिवजी ने कहा, 'आपने सीता माता का वेश धारण कर लिया, इसलिए मैं आपका त्याग करता हूं।'

इस प्रसंग के बाद ही शिवजी और सती का दांपत्य उजड़ गया था।

सीख: पति-पत्नी को एक-दूसरे की बात पर भरोसा करना चाहिए। कुछ काम ऐसे हैं, जिन्हें आपसी सहमति के साथ ही करना चाहिए। खासतौर पर जब भी कोई धार्मिक काम करते हैं तो उसमें दोनों की सहमति होनी चाहिए। जो लोग बहुत ज्यादा पढ़े-लिखे और समझदार हैं, उन्हें भी मंदिर में, कथा सुनते समय और प्रवचन में अपनी तर्क शक्ति को विराम देना चाहिए। इन जगहों से जो भी अच्छी बातें मिलती हैं, उन्हें ग्रहण करें और भक्ति करते समय तर्क को महत्व न दें। विद्वान तो शिवजी भी हैं, लेकिन उन्हें मालूम था कि सत्संग में एक सामान्य व्यक्ति की तरह श्रेष्ठ करना चाहिए। खुद श्रेष्ठ बनाकर हम दूसरों की अच्छी बातें ग्रहण नहीं कर सकते हैं।

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