कहानी- भगवान श्रीकृष्ण का ये स्वभाव था कि वे किसी भी स्थिति में हार नहीं मानते थे। लगातार कोशिश करते रहना, उनकी विशेषता थी। एक बार बालक कृष्ण और बलराम ग्वालों के साथ जंगल में खेल रहे थे। खेलते-खेलते वे काफी दूर चले गए। सभी ग्वालों को थकान होने लगी, उन्हें भूख-प्यास भी लग रही थी।
कृष्ण सभी साथियों की परेशानी समझ गए। उन्होंने ग्वालों से कहा, 'यहीं पास में कुछ ब्राह्मण अपने परिवार के साथ यज्ञ कर रहे हैं। वहां भोजन भी बना होगा। तुम सब वहां जाओ और महिलाओं को अपनी परेशानी बताकर खाना मांग लेना।'
कृष्ण की बात मानकर सभी ग्वाले ब्राह्मणों के यज्ञ स्थल पर पहुंच गए। वहां उन्होंने खाना मांगा तो उन्हें मना कर दिया गया। ग्वाले निराश होकर लौट आए और कृष्ण को पूरी बात बता दी।
कृष्ण ने कहा, 'तुम फिर जाओ और एक बार फिर खाना मांगना।'
ग्वाले बोले, 'वहां जाने का कोई लाभ नहीं है। अगर उन्होंने एक बार में नहीं दिया है तो दूसरी बार जाने पर भी वे लोग खाना नहीं देंगे।'
तब कृष्ण ने बाल ग्वालों को समझाया, 'जीवन में कभी एक बार निराशा हाथ लगे, असफलता मिल जाए तो हमें अपने प्रयासों को रोकना नहीं चाहिए। बार-बार प्रयत्न करना ही योग्य इंसान की निशानी है। हो सकता है कि हर बार असफलता मिले, लेकिन सफलता कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में प्रतीक्षा जरूर कर रही होगी। तुम सभी एक बार फिर वहां जाओ, लेकिन इस बार कुछ अलग करना। इस बार मेरा और बलराम का नाम लेकर खाना मांगना।'
ग्वाल बाल फिर वहां पहुंच गए। इस बार उन्होंने कृष्ण और बलराम का नाम लेकर खाना मांगा तो उन्हें खाना मिल गया।
सीख- यहां श्रीकृष्ण ने सीख दी है कि एक बार प्रयास करके थकना नहीं है, रुकना नहीं है। हमें बार-बार तरीके बदलकर काम करते रहना चाहिए। किसी न किसी तरीके से हमें सफलता जरूर मिल जाएगी।


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