कहानी - एक दिन गुरुनानक देव अपने शिष्यों के साथ किसी जंगल से गुजर रहे थे। उनके पास कांसे का एक कटोरा था। इस कटोरे से वे पानी पीते, खाना खाते थे। सभी शिष्य जानते थे गुरुनानक को ये कटोरा बहुत प्रिय है।
जंगल में गुरुनानक को कीचड़ का एक गड्ढा दिखाई दिया तो उन्होंने अचानक वो कटोरा उस गड्ढे में फेंक दिया। ये देखकर सभी शिष्य हैरान हो गए।
गुरुनानक ने सभी से कहा, 'जाओ, मेरा कटोरा कीचड़ से निकाल लाओ।'
कीचड़ बहुत गंदा था। सभी शिष्य सोचने लगे कि कीचड़ में से कटोरा कैसे निकालेंगे? पता नहीं ये कितना गहरा है? अंदर जाएंगे तो कपड़े खराब हो जाएंगे।
इस तरह के सोच-विचार करने के बाद सभी शिष्यों ने अलग-अलग बहाने बना दिए कि वे कटोरा नहीं निकाल पाएंगे।
गुरुनानक चुप होकर सभी की बातें सुन रहे थे, लेकिन गुरुनानक के प्रिय शिष्य लहना ने कपड़े गंदे होने की परवाह नहीं की और वह कीचड़ में उतर गया। उसने कटोरा कीचड़ से निकाला और उसे साफ पानी से धोकर गुरुनानक को दे दिया।
बाद में यही शिष्य लहना गुरु अंगद के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
सीख - गुरुनानक ने वो कटोरा कीचड़ में क्यों फेंका था? दरअसल, वे गुरु और शिष्यों के बीच के रिश्ते की परख करना चाहते थे। इस कथा की सीख यह है कि हम जिसे गुरु मानते हैं, उसकी हर बात माननी चाहिए। माता-पिता, कोई संत या अन्य कोई व्यक्ति, गुरु कोई भी हो सकता है। गुरु के साथ भरोसे का रिश्ता होना चाहिए। यही भरोसा गुरु और शिष्य के रिश्ते को मजबूत करता है।


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